Sunday, February 1, 2009

बुजुर्ग झील

यह बड़ा ताल हैं बहुत पुराना
इसने ख़ुद में संजोया है,
बरसों पुराना समय का खजाना,
अनुभवों की कहानियाँ,
पीढियों का ताना बाना ।
और देता आया हैं हमें पीढी दरपीढी
मीठे पानी , सुखद हवा, दरख्तों का नजराना ।
पर अब के बरस बारिश की खुराक नहीं आई ।
सो लोगों को आसरा देने वाला,
ख़ुद उनके आसरे हो गया ।
आस पास नज़रें उठा कर देखा ,
तो बड़ी हैरानी हुई
सोचे सोचते शाम ढल गई ।
जाने कितने ताल-पोखर-बावडी ,
तिल-तिल कर मरते नज़र आए ।
पानी के सोतों का क्या कहें ,
जिंदगी के अनुभवों से लबरेज़ - बुजुर्गवार के लटके चेहरे,
जो खत्म होने का नाम नहीं ले रहे
जेहन में तैरते चले आए
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सुबह -शाम वक्त के साथ चलने की फिराक में
आगे और आगे बढ़ने के जूनून में
उनको समझना छोड़ दिया हमने
जिन्होंने हमे समझने के लिए
ख़ुद को समझना कब का छोड़ दिया हैं
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सोचो बरस दो बरस
पानी की खुराक न मिलने पर
जब बड़े ताल को लोगों की ज़रूरत है
तो यहाँ बरसो बरस
स्नेह की बारिश न होने पर धरती तो बंजर हो चली होगी ।
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आओ तालों की मानिंद
इस तेज़ रफ्तार जिंदगी से
हर दिन, एक लम्हा, एक घंटा, एक पहर चुरा ले
हफ्ता दर हफ्ता, महीना दर महीना
कुछ पलों का विराम लेकर
बुजुर्गों के चेहरे रोशन किए जाएँ
ताकि कभी कहीं कोई बेहाल न हो जाए
और उसका हाल बड़े ताल सा न हो जाए
- कुहू