Friday, June 30, 2023

बाग़-बाग़ - सदाबहार कविताओं का संग्रह भाग -१

बाग़-बाग़ - सदाबहार कविताओं का संग्रह भाग -१  


कवियत्री  परिचय 

सुश्री राखी, मूलतः सिवनी, मध्य प्रदेश से आती हैं। जवाहर नवोदय विद्यालय से स्कूली शिक्षा के बाद उनहोनें MA मनोविज्ञान जबलपुर से और PGDDR हैदराबाद से किया। उनका बचपन भारत के विभिन्न कोनो में बीता, जिसका प्रभाव आप उनकी भाषा में निश्चय ही देख सकते हैं। हिंदी उनकी मातृ-भाषा है। हालांकि वो बचपन से ही लिखती आरही हैं पर बाग़-बाग़ के साथ हिंदी लेखन में उनका पहला प्रकाशित प्रयास है।  


बाग़-बाग़ - कविता संग्रह 

बाग़-बाग़ ताज़ातरीन हिंदी कविताओं का संकलन, पाठकों को उत्साहित-प्रेरित करने के उद्देश्य से रचा गया है। यह कविता संकलन उन हिंदी भाषी लोगों के लिए है जो समसामयिक भारतीय संस्कृति और जीवन शैली में रूचि रखते हैं। जो हिंदी बोलना, लिखना, पढ़ना चाहते और जानते हैं। यह उनके लिए भी है, जो अपनी भाषा की मिठास को सालों-साल संजोते हुए उसका आनंद लेना चाहते और जानते हैं । जो हिंदी बोल, सुन, और पढ़ कर खुश होते हैं और,अपनी माटी से जुड़ा महसूस करते हैं।


Book Link - https://notionpress.com/read/baag-baag?book=published

Blog Link -  https://rakhe-xpressions.blogspot.com/ 




Wednesday, June 28, 2023

मिठास


तुम्हारे गालों पर पड़ने वाले,

गड्ढ़ों से भी गहरी l 

और, 

तुम्हारी मोहक - नट्खट 

मुस्कान से भी प्यारी ll 

तुम्हारी 

दो बोलती हुई आँखें,

कितना कुछ बोलकर भी,

निःशब्द कर देती हैं तुम्हें  ll 

कि तुम कब,

अपनी चुप्पी तोड़ो l 

और, मैं कब 

 अपनी झिझक ll 

मुकाबला गज़ब 

का है l 

ना तुम कम हो,

ना हम कम हैं ll 

 

Wednesday, December 18, 2013

बाग़ बाग़

बाग़ बाग़ 

हाल ही हाल 
निहाल होकर 
बतियाते रहे ,
सारा समय। 
हवा, समय, मौसम, मंज़र , लोग 
सब थम गए। 
मानो हमें सांस थाम कर 
देना चाहते हों ,
दो पल का जीवन दान. 
हर कुछ खिल उठा 
और 
ज़र्रा ज़र्रा बाग़-बाग़ हो गया। 
दिल, ज़ुबाँ , दिमाग, हम, मौसम,
लाजवाब हो गए। 
हम तुम मिलकर साथ -साथ, 
जब यूँ चमकने लगे। 

आपको हिन्दी कवितायें पसंद हैं और हिन्दी को बढ़ावा देना चाहते हैं तो आयें हम सभी साथ जुड़कर हिन्दी के लिए कुछ ख़ास करेंअपनी रचनाएँ और कहानियाँ बाटें ................ आपका स्वागत है .........................

हमसाया

हमसाया

तुझ में , मुझमें,
 है मीलो का अंतर।
पर तू मुझमें,
और में तेरे भीतर।
तुझसे मैं हूँ ,
और मुझसे तू ,
पर फिर भी हम ,
है जुदा जुदा यूँ।
फिर भी साथ साथ यूँ ,
जाऊं मैं जहाँ  भी
 बस तू ही तू,
है हर कहीं।
फिर मिलता नहीं है चैन
मुझे क्यूँ कहीं भी ?
चाहे भाग कर ,
छुप जाऊं ,
दूर जाकर तुझसे कहीं।
पर ढूँढ लेता है तू ,
मुझे हर कहीं।
एक हलकी से मुस्कान से ,
जान ले लेता है फिर मेरी।
देह, दिखावे, दुनिया से परे
मुझको मुझमें मिलता हर घड़ी।

Monday, April 25, 2011

प्यार का जीवन चक्र - द्वारा राखी जवारिया

आज सुबह सुबह ,/
खैनी खाते खाते ,/
पड़ोस वाले शर्मा जी के साले साहब के बेटे का फ़ोन /
हमारे नंबर पर आया /
वो बोला, /
'चाचाजी कल रात मैं बिना पिए पहली बार /
घर चला गया /
मुझे देखते ही माँ ने कहा /
तुम्हारी तबियत तो ठीक है? /
शक्ल पर कैसे बारह बज रहे हैं /
पापा जी बोले, 'अरे , आज चाँद समय पर निकल आया/
ज़रूर दुनिया का अंत करीब है/
बहन ने कहा, 'भैय्या ने आज सुबह से मोबाइल चेक नहीं किया /
लगता है उसे बहुत गहरा सदमा लगा/
भाई बोला, ' आज उसने अपना नया लैप टॉप मुझे कॉलेज ले जाने दिया /
जरूर वो सन्यास लेने वाला है /
सभी मुझे और मैं सभी को घूरे जा रहे थे /
तभी मेरे एक दोस्त ने घर कॉल करके कहा, /
'कवि ने तो कमाल कर दिया /
दो दिनों से न तो दारू पी न ही सुट्टा लिया /
सब ठीक तो है /
हमारा वाच मैन /
जो अभी अभी घर पैसे लेने आया था/
इसी बीच उचककर बोला /
कवि भाई को एक हफ्ते से मैंने /
किसी लड़की से बात करते नहीं देखा /
ज़रूर कोई घोटाला है
/ या दाल में कुछ काला है /
मेरे आस पास सबको लगा /
मैन जिंदगी से उबकर निर्वाण लेना चाहता हूँ /
और कुछ ने मेरे पागल हो जाने का एलान कर दिया /
सच तो यह है कि /
चाचा जी आप दफ्तर और मेरी दुकान /
पास पास है/
आप के दफ्तर में नयी नयी आई एक मेम साब है /
जब वह सुबह सवेरे ऑफिस जाते हुए अपनी स्कूटी से निकलती हैं /
तो मेरी साँसे रुक जाती हैं /
पर एक काला कौव्वा हमेशा काव काव करता हुआ /
उसके आगे पीछे फिरता रहता है /
जिद पर अपनी अड़ा रहता है /
मैंने पूछा /
कवि क्या वह ऑफिस के अन्दर भी आता है ?
कवि बोला/
हाँ जी दिन रात भटकती आत्मा के जैसे उसके चक्कर लगता है /
ऑफिस छोड़ने आता हैं /
फिर घर तक साथ मंडराता है
/ मैंने जोर का कह कहा लगाया कहा,
कवि यही तो तुमने गच्चा खाया /
मेम साब के आगे पीछे मंडराने वाला कव्वा और कोई नहीं /
उनके साब है /
कवि लम्बी आह भरकर बोला,
चाचा जी धन्यवाद ,
मै सुबह का भुला शाम को जैसे घर वापस आया /
अब जाता हूँ /
सुट्टा लगता हूँ /
शाम को दोस्तों के साथ इस हार का जश्न मनाता हूँ /
आप भी आइयेगा /
महफ़िल में हमारी /
क्यूंकि आज मुझे पता चल गया प्यार व्व्यार सब बकवास है /
केवल बीयर और सुट्टा ही अपने ख़ास है
इति श्री आधुनिक प्रेम कथा कवि पुराणाये उननंचास अध्याय समापतम

Tuesday, October 26, 2010

जब हम साथ हैं ...................

जब साथ होते हैं तो धूप छांह है
जब हम साथ नहीं तो , बारिश भी बेकार है
जब हम पास हैं धड़कन सरपट भागती है
घडी की सुई थम जाती है मैं उड़ने लगती हूँ
समां थम सा जाता है लू ठंडी लगती है
बोझा हल्का हो जाता है सूरज चाँद हो जाता है
ख्याल सच से लगते हैं ग़म छूमंतर हो जाते हैं
जब हम साथ होते हैं तो धूप छांह हो जाती है