Monday, April 25, 2011

प्यार का जीवन चक्र - द्वारा राखी जवारिया

आज सुबह सुबह ,/
खैनी खाते खाते ,/
पड़ोस वाले शर्मा जी के साले साहब के बेटे का फ़ोन /
हमारे नंबर पर आया /
वो बोला, /
'चाचाजी कल रात मैं बिना पिए पहली बार /
घर चला गया /
मुझे देखते ही माँ ने कहा /
तुम्हारी तबियत तो ठीक है? /
शक्ल पर कैसे बारह बज रहे हैं /
पापा जी बोले, 'अरे , आज चाँद समय पर निकल आया/
ज़रूर दुनिया का अंत करीब है/
बहन ने कहा, 'भैय्या ने आज सुबह से मोबाइल चेक नहीं किया /
लगता है उसे बहुत गहरा सदमा लगा/
भाई बोला, ' आज उसने अपना नया लैप टॉप मुझे कॉलेज ले जाने दिया /
जरूर वो सन्यास लेने वाला है /
सभी मुझे और मैं सभी को घूरे जा रहे थे /
तभी मेरे एक दोस्त ने घर कॉल करके कहा, /
'कवि ने तो कमाल कर दिया /
दो दिनों से न तो दारू पी न ही सुट्टा लिया /
सब ठीक तो है /
हमारा वाच मैन /
जो अभी अभी घर पैसे लेने आया था/
इसी बीच उचककर बोला /
कवि भाई को एक हफ्ते से मैंने /
किसी लड़की से बात करते नहीं देखा /
ज़रूर कोई घोटाला है
/ या दाल में कुछ काला है /
मेरे आस पास सबको लगा /
मैन जिंदगी से उबकर निर्वाण लेना चाहता हूँ /
और कुछ ने मेरे पागल हो जाने का एलान कर दिया /
सच तो यह है कि /
चाचा जी आप दफ्तर और मेरी दुकान /
पास पास है/
आप के दफ्तर में नयी नयी आई एक मेम साब है /
जब वह सुबह सवेरे ऑफिस जाते हुए अपनी स्कूटी से निकलती हैं /
तो मेरी साँसे रुक जाती हैं /
पर एक काला कौव्वा हमेशा काव काव करता हुआ /
उसके आगे पीछे फिरता रहता है /
जिद पर अपनी अड़ा रहता है /
मैंने पूछा /
कवि क्या वह ऑफिस के अन्दर भी आता है ?
कवि बोला/
हाँ जी दिन रात भटकती आत्मा के जैसे उसके चक्कर लगता है /
ऑफिस छोड़ने आता हैं /
फिर घर तक साथ मंडराता है
/ मैंने जोर का कह कहा लगाया कहा,
कवि यही तो तुमने गच्चा खाया /
मेम साब के आगे पीछे मंडराने वाला कव्वा और कोई नहीं /
उनके साब है /
कवि लम्बी आह भरकर बोला,
चाचा जी धन्यवाद ,
मै सुबह का भुला शाम को जैसे घर वापस आया /
अब जाता हूँ /
सुट्टा लगता हूँ /
शाम को दोस्तों के साथ इस हार का जश्न मनाता हूँ /
आप भी आइयेगा /
महफ़िल में हमारी /
क्यूंकि आज मुझे पता चल गया प्यार व्व्यार सब बकवास है /
केवल बीयर और सुट्टा ही अपने ख़ास है
इति श्री आधुनिक प्रेम कथा कवि पुराणाये उननंचास अध्याय समापतम