बाग़ बाग़
हाल ही हाल
निहाल होकर
बतियाते रहे ,
सारा समय।
हवा, समय, मौसम, मंज़र , लोग
सब थम गए।
मानो हमें सांस थाम कर
देना चाहते हों ,
दो पल का जीवन दान.
हर कुछ खिल उठा
और
ज़र्रा ज़र्रा बाग़-बाग़ हो गया।
दिल, ज़ुबाँ , दिमाग, हम, मौसम,
लाजवाब हो गए।
हम तुम मिलकर साथ -साथ,
जब यूँ चमकने लगे।
