Wednesday, December 18, 2013

बाग़ बाग़

बाग़ बाग़ 

हाल ही हाल 
निहाल होकर 
बतियाते रहे ,
सारा समय। 
हवा, समय, मौसम, मंज़र , लोग 
सब थम गए। 
मानो हमें सांस थाम कर 
देना चाहते हों ,
दो पल का जीवन दान. 
हर कुछ खिल उठा 
और 
ज़र्रा ज़र्रा बाग़-बाग़ हो गया। 
दिल, ज़ुबाँ , दिमाग, हम, मौसम,
लाजवाब हो गए। 
हम तुम मिलकर साथ -साथ, 
जब यूँ चमकने लगे। 

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हमसाया

हमसाया

तुझ में , मुझमें,
 है मीलो का अंतर।
पर तू मुझमें,
और में तेरे भीतर।
तुझसे मैं हूँ ,
और मुझसे तू ,
पर फिर भी हम ,
है जुदा जुदा यूँ।
फिर भी साथ साथ यूँ ,
जाऊं मैं जहाँ  भी
 बस तू ही तू,
है हर कहीं।
फिर मिलता नहीं है चैन
मुझे क्यूँ कहीं भी ?
चाहे भाग कर ,
छुप जाऊं ,
दूर जाकर तुझसे कहीं।
पर ढूँढ लेता है तू ,
मुझे हर कहीं।
एक हलकी से मुस्कान से ,
जान ले लेता है फिर मेरी।
देह, दिखावे, दुनिया से परे
मुझको मुझमें मिलता हर घड़ी।