तुम्हारा ख़ुद रूठ जाना औरफिर मुझको मनाना ,
खिलखिला कर हँसना, फिर चुपके से मुस्कुराना
जब मैं रूठ जाऊं तो .............मनाना, मनाना, मनाते ही जाना ।
वोह हौले से आना......... ..और आकर दीवार पर टिक जाना।
वो बहना, वो गहना , वो बातें बनाना ।
वो धीरे से पीठ पर धौल ज़माना ।
पकाते पकाते भजन गुनगुनाना ।
तुम्हारा वो सँझा में तुलसा पर दीये जलाना।
वो बाहर से हँसना भीतर से रोना ।
मेरे लिए दूसरों के ताने सहना ।
कुछ पूछने पर चुपके से मुस्कुराना ।
आँचल के छोर को माथे पर लगाना ।
मेरे लिए सँझा को तुलसा पर दीये जलाना ।
वो बहना, वो गहना , वो बातें बनाना ।
तुम्हारा ख़ुद रूठ जाना फिर मुझको मनाना ।

मां
ReplyDeleteकितनी याद
आती है
मां
बार-बार
याद आती है
मां
घर छोड़कर
शहर तों आ गया
पर
बिन तेरे रह नहीं पाता
मां
याद आती हैं
तेरे हाथ की बनी
रोटियां
और
तेरा दुलार
कितना अच्छा होता
कि
गाँव में ही
मिल जाता
रोजगार
ताकि कभी
दूर
न होते
तेरी ममता कि छांव
और
प्यार।
ये कविता मैंने लिखी है मैं. आप कैसे हो और आपने बताया भी नहीं कि अपने ब्लॉग बनाया है. ये ग़लत बात है. आपकी कविता बहुत ही प्यारी है. ऐसे ही लिखते रहे. नव वर्ष की शुभकामनायें. मकर संक्रांति, लोहड़ी, पोंगल और बिहू की ढेरों शुभकामनायें.
प्रशान्त (अवाम) एमजे
और आपसे अनुरोध है की मेरे ब्लॉग को भी विसिट कर एक कमेन्ट दे दीजिये
The human heart feels things the eyes cannot see, and knows what the mind cannot understand.
ReplyDeleteVery lovely
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