Wednesday, December 18, 2013

बाग़ बाग़

बाग़ बाग़ 

हाल ही हाल 
निहाल होकर 
बतियाते रहे ,
सारा समय। 
हवा, समय, मौसम, मंज़र , लोग 
सब थम गए। 
मानो हमें सांस थाम कर 
देना चाहते हों ,
दो पल का जीवन दान. 
हर कुछ खिल उठा 
और 
ज़र्रा ज़र्रा बाग़-बाग़ हो गया। 
दिल, ज़ुबाँ , दिमाग, हम, मौसम,
लाजवाब हो गए। 
हम तुम मिलकर साथ -साथ, 
जब यूँ चमकने लगे। 

2 comments: